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आगे कुआं, पीछे खाई! जिनपिंग के भरोसे बैठे पाकिस्तान को डोनाल्ड ट्रंप ने दिया ऐसा अल्टीमेटम, देश में मच सकता है बवाल

​शी जिनपिंग से नजदीकियों के बीच पाकिस्तान पर डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा दांव, क्या इजरायल को मान्यता देने पर मजबूर होंगे शहबाज शरीफ?

 

इस्लामाबाद/बीजिंग:

आर्थिक बदहाली और कंगाली के दौर से गुजर रहा पाकिस्तान इस वक्त एक बहुत बड़े कूटनीतिक धर्मसंकट में फंस गया है। एक तरफ जहां पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ अपनी खाली झोली भरने के लिए बीजिंग पहुंचे हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ वाशिंगटन से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐसा गुगली फेंक दी है, जिसने इस्लामाबाद के होश उड़ा दिए हैं।

​जब पीएम शहबाज शरीफ बीजिंग में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से हाथ मिलाकर द्विपक्षीय कसीदे पढ़ रहे थे, ठीक उसी वक्त डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कर दिया कि पाकिस्तान को अब 'अब्राहम अकॉर्ड्स' (Abraham Accords) का हिस्सा बनना ही होगा। ट्रंप के इस रुख ने पाकिस्तानी हुक्मरानों और वहां के सैन्य जनरलों की रातों की नींद उड़ा दी है।

​जिनपिंग का स्वागत और ट्रंप का 'एक्शन'

​गंभीर आर्थिक संकट, आसमान छूती महंगाई और बुनियादी चीजों की किल्लत से जूझ रहे पाकिस्तान के मुखिया शहबाज शरीफ एक बार फिर वित्तीय मदद की उम्मीद में चीन के दौरे पर हैं। बीजिंग में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया और हमेशा की तरह सदाबहार दोस्ती का दम भरा। जिनपिंग की ओर से मिली इस थपकी से शहबाज शरीफ राहत की सांस ले ही रहे थे कि अमेरिका से आई एक खबर ने पाकिस्तान के जश्न को फिक्र में बदल दिया।

​डोनाल्ड ट्रंप ने साफ शब्दों में संकेत दे दिए हैं कि पाकिस्तान को अब्राहम अकॉर्ड्स पर हस्ताक्षर करने होंगे। कूटनीतिक गलियारों में इसे ट्रंप का 'नमक का हिसाब' मांगा जाना कहा जा रहा है, क्योंकि कुछ ही समय पहले पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने अमेरिका का दौरा कर ट्रंप के साथ करीबियां बढ़ाई थीं।

​पाकिस्तान के लिए 'सांप-छछूंदर' जैसी स्थिति

​ट्रंप की इस शर्त ने पाकिस्तान को ऐसी जगह ला खड़ा किया है जहां उसके लिए 'आगे कुआं और पीछे खाई' वाली स्थिति है। अब्राहम अकॉर्ड्स पर हस्ताक्षर करने का सीधा और साफ मतलब है— इजरायल को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देना।

​पाकिस्तान की घरेलू राजनीति और वहां का कट्टरपंथी मिजाज कभी भी इजरायल को स्वीकार करने की इजाजत नहीं देता। अगर शहबाज शरीफ सरकार या सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर अमेरिकी दबाव में आकर ऐसा कोई कदम उठाते हैं, तो देश के भीतर तख्तापलट या भयंकर गृहयुद्ध जैसे हालात बन सकते हैं। दूसरी तरफ, अगर पाकिस्तान अमेरिका की बात नहीं मानता, तो उस पर मिलने वाली वैश्विक वित्तीय मदद और आईएमएफ (IMF) के कर्जों पर तलवार लटक जाएगी।

​जनरल आसिम मुनीर की रणनीति पर उठे सवाल

​विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने अमेरिका के साथ जो 'डिनर डिप्लोमेसी' की थी, वह अब पाकिस्तान के गले की फांस बन चुकी है। मुनीर ने पाकिस्तान को एक ऐसे भू-राजनीतिक दलदल में धकेल दिया है, जहां से बिना नुकसान के बाहर निकलना नामुमकिन नजर आ रहा है।

​अब देखना यह होगा कि चीन की गोद में बैठकर अमेरिका को साधने की कोशिश करने वाला पाकिस्तान, डोनाल्ड ट्रंप के इस चक्रव्यूह से खुद को कैसे बाहर निकालता है।


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